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अंबेडकर भीम जयंती 2021: बीआर अंबेडकर की 130 वीं जयंती का मूल्य और महत्व

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अंबेडकर भीम जयंती 2021: बीआर अंबेडकर की 130 वीं जयंती का मूल्य और महत्व
अंबेडकर भीम जयंती 2021: बीआर अंबेडकर की 130 वीं जयंती का मूल्य और महत्व
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अंबेडकर जयंती 2021: अंबेडकर, का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को हुआ था , ने अपना जीवन देश के पिछड़े समुदायों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया, जिनमें दलित, अल्पसंख्यक, और अनुसूचित जाति (SC) / अनुसूचित जनजाति (ST) शामिल हैं, और देश के संविधान के  निर्माण के लिए याद किया जाता  है और आजाद भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में भी जाना जाता है।

पीएम नरेंद्र मोदी ने हाल ही में घोषणा की कि बी आर अंबेडकर और ज्योतिबा फुले की जयंती को ‘टीका उत्सव’ के रूप में मनाया जाएगा, जिसका उद्देश्य चार दिवसीय उत्सव है, जिसका उद्देश्य प्राथमिकता वर्गों (45 वर्ष से अधिक) के लिए टीकाकरण कवरेज बढ़ाना है। 14 अप्रैल को केंद्र सरकार ने अवकाश घोषित किया है।

डॉ. बी आर अंबेडकर की 130 वीं जयंती पर भीम जयंती का महत्व

– दलित होने के नाते, अम्बेडकर ने देश में पिछड़े समुदायों द्वारा सामाजिक अन्याय का विरोध किया। उन्होंने अपने प्रसिद्ध निबंध- “कोई चपरासी, कोई पानी नहीं” में दलितों के सामने आने वाली कठिनाइयों पर प्रकाश डाला। निबंध उस समय को याद करता है जब अंबेडकर पीने के पानी से वंचित थे। भारत सरकार ने दलित अधिकारों की रक्षा के लिए 31 मार्च, 1995 को अत्याचार निवारण (POA) अधिनियम बनाया

– अंबेडकर को “भारतीय संविधान के पिता” के रूप में जाना जाता है, क्योंकि 29 अगस्त, 1947 से 24 जनवरी, 1950 तक भारत के कानून मंत्री के रूप में कार्य करते हुए, उन्होंने देश के संविधान का मसौदा तैयार किया, जो 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ।

– वह देश की अर्थव्यवस्था को आकार देने में भी प्रभावशाली थे। अंबेडकर ने 1951 में भारत के वित्त आयोग की स्थापना की और भारतीय रिज़र्व बैंक के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो उनके दिशानिर्देशों और विचारों के तहत संचालित होता है।

– 31 मार्च, 1990 को, अंबेडकर को उनके योगदान के लिए मरणोपरांत भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया।

व्यक्तिगत जीवन

परिवार

अंबेडकर के दादा का नाम मालोजी सकपाल था, तथा पिता का नाम रामजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था। 1906 में अंबेडकर जब पाँच वर्ष के थे तब उनकी माँ की मृत्यू हुई थी। इसलिए उन्हें बुआ मीराबाई ने संभाला था, जो उनके पिता की बडी बहन थी। मीराबाई के कहने पर रामजी ने जीजाबाई से पुनर्विवाह किया, ताकि बालक भीमराव को माँ का प्यार मिल सके। बालक भीमराव जब पाँचवी अंग्रेजी कक्षा पढ रहे थे, तब उनकी शादी रमाबाई से हुई। रमाबाई और भीमराव को पाँच बच्चे भी हुए – जिनमें चार पुत्र: यशवंत, रमेश, गंगाधर, राजरत्न और एक पुत्री: इन्दु थी। किंतु ‘यशवंत’ को छोड़कर सभी संतानों की बचपन में ही मृत्यु हो गई थीं। प्रकाश, रमाबाई, आनंदराज तथा भीमराव यह चारो यशवंत अंबेडकर की संताने हैं।

निधन

1948 से, अंबेडकर मधुमेह से पीड़ित थे। जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो कमजोर होती दृष्टि से ग्रस्त थे। राजनीतिक मुद्दों से परेशान अंबेडकर का स्वास्थ्य बद से बदतर होता चला गया और 1955 के दौरान किये गये लगातार काम ने उन्हें तोड़ कर रख दिया। अपनी अंतिम पांडुलिपि भगवान बुद्ध और उनका धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसम्बर 1956 को अंबेडकर का महापरिनिर्वाण नींद में दिल्ली में उनके घर मे हो गया। तब उनकी आयु ६४ वर्ष एवं ७ महिने की थी। दिल्ली से विशेष विमान द्वारा उनका पार्थिव मुंबई में उनके घर राजगृह में लाया गया। 7 दिसंबर को मुंबई में दादर चौपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली में अंतिम संस्कार किया गया जिसमें उनके लाखों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया। उनके अंतिम संस्कार के समय उनके पार्थिव को साक्षी रखकर उनके 10,00,000 से अधिक अनुयायीओं ने भदन्त आनन्द कौसल्यायन द्वारा बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी, क्योकि अंबेडकर ने 16 दिसंबर 1956 को मुंबई में एक बौद्ध धर्मांतरण कार्यक्रम आयोजित किया था।